जोड़कर मैंने प्रकृति से, खींचा है प्रतिविम्ब एक
हो अगर साहस तुझी में, ले तू मुड़कर उसको देख
है नहीं कुछ भी यहाँ पर , श्याम हो या वर्ण श्वेत
कल्पना से रच मैं डाला , है नहीं यह अंड रेत
रेत की मछली नहीं है , संवेदनाओं का है तंत्र
चित्र यूँ ही बन गया है , बिन उठाये कोई यंत्र
गिरिजेश ''गिरि'
FICTION
Through this poem the poet created his fiction as I have drawn an image from the nature, if you dare you may take a turn and look at. There is nothing here that may be black or white characters. I have created it by imagination not from conjugation. it is not created from sperms and ovules but a mechanism of powerful emotions. Thats why this image is created spontaneously without any means.
girijesh''giri''
( चित्र गूगल से साभार)
हो अगर साहस तुझी में, ले तू मुड़कर उसको देख
है नहीं कुछ भी यहाँ पर , श्याम हो या वर्ण श्वेत
कल्पना से रच मैं डाला , है नहीं यह अंड रेत
रेत की मछली नहीं है , संवेदनाओं का है तंत्र
चित्र यूँ ही बन गया है , बिन उठाये कोई यंत्र
गिरिजेश ''गिरि'
FICTION
Through this poem the poet created his fiction as I have drawn an image from the nature, if you dare you may take a turn and look at. There is nothing here that may be black or white characters. I have created it by imagination not from conjugation. it is not created from sperms and ovules but a mechanism of powerful emotions. Thats why this image is created spontaneously without any means.
girijesh''giri''
( चित्र गूगल से साभार)
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