Sunday, 16 August 2015
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"पिता" (The Father) पिता ज्यामिति की ऋजु रेखा नहीं है वह त्रिकोणमिति है जो आसमां में उड़ने वाले पक्षियों की ऊंचाई नाप लेता है वह ...
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एक दिन ब दिन क्षीण होती आवाज़ जिसकी झंकार अब कानों तक नहीं पहुंचती उसका शांत हो जाना ही अच्छा है क्योंकि ऐसी आवाज़ जो सुनी न जा सके ...
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आज सहसा कलम की स्याही रक्तिम हो गयी जिससे निकलती है एक हृदय विदारक चीख जो मांग रहे थे आतंकियों से अपने जीवन की भी...
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अमल कोमल तन तेरा है शुचित सुरभित मन मेरा है नूपुरों सी बज रही हो आज तुम क्यों सज रही हो हो रहा है मुझमेँ कुछ-कुछ है ये तेरा जादू सचम...
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कोरोना हे ! इंसान कितने गरीब हो तुम कितने असहाय हो तुम तुमने लाखों,करोड़ों कमाए पर क्या कुछ काम आए कितने छल कपट किये आखिर किसलिए आ...
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अपने अरमानों की पोटली बांधे सुदूर गांव से निजी वाहनों की धक्कम-धुक्की सहते आता है बूढ़ा किसान कचहरी में यह आस लगाये काली कोट वालों...
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