Sunday, 16 August 2015
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"पिता" (The Father) पिता ज्यामिति की ऋजु रेखा नहीं है वह त्रिकोणमिति है जो आसमां में उड़ने वाले पक्षियों की ऊंचाई नाप लेता है वह ...
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अँधेरी कोठरी सुनसान झींगुरों और रेवों की आवाज़ से परेशान झकझोरती हैं ये आवाजें उकसाती हैं मेरे अहं को मगर मैं चुप-चाप क्या...
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एक कविते मेरी तू कर श्रृंगार चाहिए नहीँ रस अलंकार बनो प्रेरणा तुम मेरी वर्णित कर दूँ मैँ क्षवि तेरी भर दूँ ज्योति तुम्हार...
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मेरा अंतर्मन क्यूँ करता है? अनंत में विचरन क्यूँ भरता है एक ऐसी उड़ान जो किसी मंजिल तक नहीं जाती है क्या यह गगन क़ी ऊँचाइयों को छू सक...
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पास जब प्रियतम खड़ा हो कहो कासे सन्देश भेजूँ होता यदि परदेश में वह भेज देती मेघ को बोल सकती मैं नहीं क्योंकि पहरे हैं यहाँ बह रही जग क...
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अरे! रूपसि बनो प्रेयसि लिखूँगा गीत तुम पर मैँ बना के अश्क को मोती बिखेरूँगा तेरी ज्योती अगर हो दीप सी क्षमता जलोगी तुम जलूँगा मैँ ...
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