जीवन
और प्रकृति
वीरान
सी जिंदगी में
शिकायतों
का दौर
थम
सा गया है
एक
अदृश्य विषाणु ,
जिसे
सजीव कहूँ या निर्जीव ?
किन्तु
कोहराम
सा मचा रखा है
चारों
तरफ
एक
शांत सी हलचल
जिससे
हैं सब उद्वेलित
पर
विवश हो गए हैं ,
खुद
को कैद रखने को .
एकाएक
चिकित्सा
तंत्र से
कोई
आता है
और
उठा लेता है
हममें
से किसी एक को
फिर
कुछ पता नहीं चलता
और
एक दिन सूचना मिलती है कि
वे
शिकार हो गए
किसी
अदृश्य जीव के
मिलता
कुछ नहीं
सिवा
सूचना के
यहाँ
तक कि
लाश
भी नहीं मिलती है
आखिर
कब
तक चलेगा
ये
मौत का दौर
या
मिलेगा कहीं ठौर ?
वैज्ञानिक
भी लगा रहे हैं
अपनी
एडी -चोटी का जोर
किन्तु
सफलता
कहाँ तक मिलती है ?
यह
भी एक प्रश्न चिह्न ही है
होगी
कोई रोक-थाम ?
या
प्रकृति
अपना रौद्र रूप
दिखा
कर ही मानेगी
अंततः
प्रकृति
ही नियति है
जिसके
आगे सब हैं मजबूर
फिर
भी
कोशिश
करना
अपना
धर्म है
जो
हम निभा रहे हैं
बाकी
सब कुछ तो
है
उसी के हाथ
जिसके
अंग तो
रहा
भी तो नहीं जा सकता
गिरिजेश
‘’गिरि’’
